भुलरू बाबा के रहस्य

गाँव में एकहि गो नाव सभकरा बतकही पर चढ़ल रहे, उ रहे भुलरू बाबा के नेकी आ दान धरम ।

लोग बाग कहत रहले कि ऊ साधारण मनई ना, देवता के रूप हउवन।

पाँच गो भाई में तिसरका, आ चालीस बरिस के हो गइले बाकिर बिआहो ना कइले आ ऊपर से विद्वान आ दानी।

गांव में बाबा के बाबू जी स्कूल खोलले रहले। बाद में पक्का बनल आ सरकार से मान्यता भी मिल गइल। प्रिंसिपल आ सीनियर मास्टर खुदे भुलरू बाबा रहले।

भुलरु बाबा के जिनगी स्कूल के लइका-बच्चा से मीठ बोलत, गरीब-गुरबा के घर अनाज भेजत, मठ-मंदिर में चंदा देत बीतत रहें।

लोग कहत ना अघाए कि,

“अइसन करम आ सेवा त आज के जमाना में बिरले देखे सुने के मिलेला।”

बाकिर, देवता के ई चमचम छवि के पीछे एगो गाढ़ अन्हियार लुकाइल रहे।

गाँव के ओह स्कूल में जब-जब नयकी अंग्रेजी मास्टरनी अइली जा, छमासे भीतर उनकर लास मिले लागल।

कबहुँ खेत किनारे, कबहुँ बीच आंगन के तोपल भूतहा कुंइआ में।

मजेदार बात इ रहें कि बिना पुलिस रपट के भुलरू बाबा के घर के लोग ओह लास के गांवे में जरा देत रहले।

केहू के हिम्मत ना पड़ल कि सवाल उठावें।

गाँव भर के पेट आखिरकार बाबा के रहमो-करम प टिकल रहुवे।

इ घटना हमरा आँखि के आगहि घटल रहे। बीतत अक्टूबर के महीना रहे,  गुलाबी जाड़ा चहुँदिस छवाइल रहे।

ए बरिस हमार सखी पुष्पा के मउसी बाबा के स्कूल में अगरेजी पढ़ावे
आइल रहली।

गाँव में हलचल मच गइल,

खूब गोर-सुग्घर नाक नक्शा, सहरिया रहन-सहन वाली मास्टरनी।

गाँव वाला काने कान फुसफुसात कहे लोग कि,

“देखिहऽ, इ हो छः महीना से बेसी ना टिकिहे।”

बाकी अबकी बात कुछु अउर रहे, उ नवकी अंग्रेजी के मास्टरनी के नाता बाबा के घर से जुड़ल रहे। ऊ भूलरू बाबा के छोट भाई के साली रहली।

एह से कबहू-कभार बाबा के घर में भी ठहर जात रहली।

घर बड़का हवेली जइसन रहे –माई-बाबू, चार गो भाई-भौजाई, दसन गो भतीजा-भतीजी से भरल पूरल। केकरो करेजा में शक जागिए ना सकते रहें।

छः महीना त सब ठीक-ठाक चलल। बाकिर छमासे बीतल कि बइसाख जेठ के भोर में दिसा-मैदान खातिर नहर के ओर गइल लोग हाला कइले कि, एगो मेहरारू के उघार देह लास बधारि में पड़ल बा। चीन्हें वाला चीन्ह गइले कि उ लास नयकी मास्टरनी आ पुष्पा के मउसी के ह।”

गाँव भर के चेहरा पीयर पड़ गइल। बाकिर बोलें के हिम्मत अभियो केहू में ना रहे।

लोग-बाग बुझ गइले कि अब का होखे वाला बा।

बाबा के घरवाला लोग जल्दी-जल्दी लास जरावे के परबंध करें लागल ।

उहे पुरान डायलॉग कि “गाँवे में जरा दऽ, सगरी बात खतम।”

बाकिर ऐह बेर त मामिला अलग हो गइल रहें।

अध्यापिका के माई-बाबू शहर से गांवे आ गइलें आ गरज उठलें लोग,

“ना, इ लाश ना जरि, पहिले पोस्टमारटम होई। हमरा बेटी के मौत के सच्चाई त पता चले।”

गाँव के पंचायत हिल गइल, क गो मेहरारूअन आ उनकर मनसेदू के सेराइल करेजा के आगि फेर से धधा गइल।

भूलरू बाबा के चेहरा सख्त हो गइल रहें। भाई-भतीजा मय एकवट के मास्टरनी के माई बाबू के गरियावे लगलें।

तले पुलिस भी चहुप आइल। पूछताछ , हो-हंगामा होत रहे,  बाकिर बाबा के रसूख के आगे मुढ़ी नेवा लिहलस। पुलिस आपन पाकिट बरियार क के ओजुग से लास लेके अभी निकलते रहें तले बाबा के भवह के चिचिआए के आवाज से मय मरदान लोग के गोड़ तर के धरती खसक गइल।

गाँव दू फाड़ में हो गइल रहें। छोटकी कनिया के संगे मय कमकरीन, बनिहारिन आ एक दूगो पढ़ल लिखल नवकी कनिया भी रहली जा।

बाकिर नरभक्षियन के झुंड में गाय-बकरी के कवन बिसात रहें। मालिक मलिकार हांक के फेर से घर के भीतर क देले।

गांव में जहवा बाबा के मर्जी के खिलाफ एगो पत्ता ना डोलत रहे आज उनकरा बारे में अनाप-शनाप बोले खाती हिम्मत जुटल, इहे बहुत बड़ बात रहे?

कुछ महिनन तक बाबा के आंतक गांव के उ कुल घर प गाहे-बगाहे बरसल जे उनकरा खिलाफ आवाज उठवले रहें।

जेकरे दया धरम से घर के चूल्हा जरत रहे, उ क घरी रार करित?

मय मामिला घर के भीतर बस फुसफुसाहट भर रह गइल।

कुछे दिन बाद गांव में नया कोहराम उठल। भूलरू बाबा के भवह, जे मास्टरनी के बहिन रहली, गते-गते पगली लेखा हरकत करें लगली।

कबो पूजा-पाठ में घरे आइल हीत-नात आ गांव घर के मेहरारूअन के बीच में बइठ के अनायासे बोले लागस,

“जान तानी जी, स्कूल से सटल कोठारी आ हई बीच आंगन के कुइआ…इ मय रहस नइखे, ओकरा में भुलरू के बड़का कारस्तानी बा”

“जेतना कमकरिन, मेहरारू आ लइकीं भुलाइल बाड़ी सन… सभकर घिघिआइल आ रोआइ ऐही कुइआ में अमा गइल बा।”

लोग भक्क मरले इ बात सुनें।

कबो राति के छत प से चिचिआत रहली,

“हम देखनी ह, मय उहे कइले बा… भूलरू, पिशाच ह, सभकरा के इहे मरले बा…!”

कुछ दिन बाद उनकरा के घर में रसरी में बान्ह के राखल जात रहें।

मध्य रात में हवेली से बड़ा दर्दनाक चीख उठत रहे। जइसे केहू के गरदन रेतल जात होखे

भुलरू बाबा के देवता माने वाला कुछ गाँव के लोग कहे कि,

“पगली हो गइल बाड़ी कनिया, भूत-प्रेत के हवा लाग गइल बा।”

हवेली के भीतरी के बात बाहर तक ले आवे के काम घर के नौकर-चाकर के ही रहे। बाकिर अब उहो लोग उनकरा के घर में ना देखत रहूंअन। इहो चर्चा के बात रहें।

धीरे-धीरे उ घर में ही कैद क दिहल गइली।

महिना-दर-महिना उनकरा के केहू देख ना पावल। फेर अचानके चार महीना बाद, गूलर के डार प उनकर लास लटकल मिलल।

राह चलत लोग कनिया के लास देखि के चिहा गइले। बुझात रहें कि

कनिया के मुँह प अभियो उहे गीत अटकल रहे जवन उ राति के छत के मुंडेर प बइठ के गावत रहली,

“मुंह खोलनी त काला पानी… सहत रहली त रहनी महारानी…”

गाँव भर में अइसन सन्नाटा पसर गइल रहे, जइसे सब कुछ थथम गइल होखे।

भर गांव दउड़ल आइल, जेतना मुंह ओतने बात होत रहें,

“पगली आपन जान दे दिहलस।”

केहू फुसफुसाइल,

“पगली कुआं में कुदी, कि गूलर प रसरी से फांसी लगा लिही?”

श्मशान घाट प घर के लोग जुटल, ओजुग भूलरू बाबा भी चुपचाप खड़ा रहलें। उनकर चेहरा रहस्यमयी गंभीर भाव से भरल रहे।

कनिया के लास बिना पुलिस रिपोर्ट आ बेपूछताछ के जरा दिहल गइल।

केहू के हिम्मत ना जुट पावल कि ऊ भूलरू बाबा से कुछू पूछस।

भूलरू बाबा, जिनकरा के बहुत घर में पूजल जात रहें, ऊ देवता आ दरिंदा के बीच के रहस्य बन के रह गइले।

उनकर रहस्यमयी कथा आजो गाँव के लोकगीत आ कहावत में गुँथल बा, जवन सालों-साल तक फुसफुसात रही।

 

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  • बिम्मी कुंवर सिंह

भोजपुरी लेखक

धुबरी, असम

 

sanjaybimmi@gmail.com

8160492100

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